सुपौल: भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक श्री रविन्द्र शास्त्री महाराज ने युवाओं को दिया आध्यात्मिक जीवन, सदाचार और मोक्ष प्राप्ति का संदेश

धरहारा में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन कथावाचक रविन्द्र शास्त्री महाराज ने युवाओं को आध्यात्मिक जीवन अपनाने, सदाचार के मार्ग पर चलने और भागवत श्रवण से मोक्ष प्राप्ति का संदेश

Report: A.K Chaudhary

जिले के राघोपुर प्रखंड के धरहारा वार्ड संख्या 13 में शिवनंदन चौधरी के आवास पर आयोजित सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दूसरे दिन अयोध्या धाम से आये कथावाचक श्री रविन्द्र शास्त्री जी महाराज ने श्रद्धालुओं को कथा का रसपान कराते हुए विशेष रूप से युवाओं को आध्यात्मिक मार्ग अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि मानव जीवन अत्यंत अमूल्य है और इसे व्यर्थ विषय-वासनाओं में नहीं गंवाना चाहिए।

प्रवचन के दौरान कथावाचक ने कहा कि सनातन धर्म में अनेक पुराण और ग्रंथ हैं, लेकिन तीन ग्रंथ — श्रीमद्भागवत महापुराण, श्रीमद्भगवद्गीता और श्रीरामचरितमानस — वांग्मयी मूर्ति के समान हैं। इन ग्रंथों से युवाओं को जीवन जीने की कला, समाज में आचरण और मृत्यु को भी पवित्र बनाने की शिक्षा मिलती है। उन्होंने बताया कि रामचरितमानस से जीवन जीने की कला मिलती है, जबकि भागवत कथा श्रवण से मृत्यु भी मंगलमय हो जाती है।

प्रवचन के दौरान उन्होंने भागवत के अनुसार पांच प्रकार के पापों से बचने की सीख दी। इनमें ब्रह्महत्या, गौहत्या, सोना चोरी करना, मदिरापान करना तथा ऐसे पाप करने वालों का संग करना शामिल है। उन्होंने कहा कि इन पापों से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय भागवत कथा का श्रवण है। कथा में धुंधकारी के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए महाराज ने बताया कि वह अत्यंत पापी था, लेकिन श्रीमद्भागवत कथा सुनने से प्रेत योनि से मुक्त हो गया। इससे यह सिद्ध होता है कि भागवत कथा मनुष्य को भक्ति, मुक्ति, सुख, समृद्धि तथा भौतिक और पारलौकिक शांति प्रदान करती है।

उन्होंने भागवत की दो प्रमुख परंपराओं का भी वर्णन किया। पहली परंपरा में भगवान नारायण से ब्रह्मा, ब्रह्मा से नारद, नारद से वेदव्यास, वेदव्यास से शुकदेव जी और शुकदेव जी से राजा परीक्षित को ज्ञान प्राप्त हुआ। दूसरी परंपरा में शेषनाग से सनकादिक ऋषि, उनसे नारद और फिर वेदव्यास तक भागवत ज्ञान पहुंचा।

रविन्द्र शास्त्री जी ने युवाओं से आह्वान किया कि वे अध्यात्म से जुड़ें, क्योंकि आध्यात्मिक युवा ही राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने स्वामी विवेकानंद का उदाहरण देते हुए कहा कि आध्यात्मिक शक्ति से जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है। कथा के समापन प्रसंग में राजा परीक्षित का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि श्रापवश तक्षक नाग के डंसने से मृत्यु निश्चित होने के बावजूद भागवत कथा श्रवण से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हुई। मानव जीवन का परम लक्ष्य भी ईश्वर प्राप्ति होना चाहिए। कथा के दूसरे दिन भारी बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और पूरे पंडाल में भक्ति का वातावरण बना रहा।

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