Report: A.K Chaudhary
मिथिलांचल सहित पूरे सुपौल जिले में शनिवार को वट सावित्री व्रत श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ मनाया गया। सुबह से ही जिले के शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित बरगद (वट) वृक्षों के पास सुहागिन महिलाओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी। रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधानों, सोलह श्रृंगार और हाथों में पूजा की थाल लिए महिलाएं वट वृक्ष की पूजा-अर्चना करती नजर आईं। पूजा स्थलों पर मंत्रोच्चार, लोकगीतों और भक्ति भाव से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।

सुहागिन महिलाओं ने विधि-विधान के साथ व्रत रखकर वट वृक्ष की पूजा की तथा वृक्ष की परिक्रमा करते हुए कच्चा धागा बांधा और अपने पति की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि तथा अखंड सौभाग्य की कामना की। कई स्थानों पर महिलाओं ने समूह बनाकर पारंपरिक गीत गाए और धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया। पूजा के दौरान सावित्री और सत्यवान की अमर कथा का श्रवण भी किया गया, जिसे इस व्रत का प्रमुख आधार माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार माता सावित्री ने अपने अटूट प्रेम, तपस्या, बुद्धिमत्ता और दृढ़ संकल्प के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। तभी से यह व्रत पति-पत्नी के अटूट प्रेम, समर्पण और विश्वास का प्रतीक माना जाता है। इसी मान्यता के कारण सुहागिन महिलाएं हर वर्ष ज्येष्ठ मास की अमावस्या या पूर्णिमा तिथि के अवसर पर यह व्रत करती हैं।

जानकारों के अनुसार वट वृक्ष यानी बरगद का वृक्ष दीर्घायु, स्थिरता, शक्ति और अखंडता का प्रतीक माना जाता है। इसकी जड़ें, शाखाएं और लंबे समय तक जीवित रहने की क्षमता जीवन में मजबूती और निरंतरता का संदेश देती हैं। यही वजह है कि वट वृक्ष की पूजा का विशेष महत्व है।
वट सावित्री व्रत का महत्व
वट सावित्री व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान भर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में वैवाहिक संबंधों की मजबूती, पारिवारिक मूल्यों और नारी शक्ति का भी प्रतीक है। यह व्रत त्याग, समर्पण, धैर्य और अटूट विश्वास का संदेश देता है। मिथिलांचल की सांस्कृतिक विरासत में इस पर्व का विशेष स्थान है, जहां महिलाएं इसे परंपरा, आस्था और परिवार की खुशहाली से जोड़कर देखती हैं।
जिले के विभिन्न पूजा स्थलों पर उमड़ी महिलाओं की भीड़ और उत्साह यह बताने के लिए काफी था कि आज भी लोकआस्था और परंपराओं की जड़ें समाज में कितनी मजबूत हैं। वट सावित्री व्रत ने एक बार फिर सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया।







