Report: A.K. Chaudhary
सुपौल जिले के राघोपुर प्रखंड क्षेत्र अंतर्गत गणपतगंज बाजार स्थित सार्वजनिक दुर्गा मंदिर शारदीय नवरात्र के अवसर पर श्रद्धा और भक्ति का प्रमुख केंद्र बना हुआ है। नवरात्र के छठे दिन शुक्रवार को मंदिर में मां दुर्गा के छठे स्वरूप मां कात्यायनी की विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान श्रद्धालुओं ने मां के दर्शन कर सुख, शांति, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। सुबह से ही मंदिर परिसर में भक्तिमय माहौल बना रहा। मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालुओं की आवाजाही जारी रही।

नवरात्र को लेकर मंदिर को रंग-बिरंगी झालरों और आकर्षक बल्बों से सजाया गया है। सजावट के कारण मंदिर परिसर की सुंदरता देखते ही बन रही है। मंदिर में पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय बना हुआ है। मां दुर्गा के प्रति श्रद्धालुओं की गहरी आस्था और विश्वास इस प्राचीन मंदिर की विशेष पहचान है।
152 वर्ष पुराना है मंदिर का इतिहास
मंदिर पूजा समिति के सदस्यों के अनुसार, गणपतगंज स्थित सार्वजनिक दुर्गा मंदिर का इतिहास लगभग 152 वर्ष पुराना है। मंदिर की नींव हरावत राज के जमींदार गणपत सिंह और नरपत सिंह ने रखी थी। प्रारंभ में यह मंदिर देवीपुर पंचायत के कोरियापट्टी गांव में स्थित था। उस समय सड़क मार्ग की सुविधा और आवागमन में कठिनाई के कारण श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचने में परेशानी होती थी।

इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए लगभग 119 वर्ष पूर्व मंदिर को कोरियापट्टी गांव से गणपतगंज बाजार में स्थापित किया गया। इसके बाद से यह मंदिर धीरे-धीरे पूरे इलाके के लोगों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन गया। आज भी आसपास के गांवों और दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां पहुंचकर मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं।
मां के दरबार से खाली हाथ नहीं लौटते भक्त
स्थानीय लोगों के बीच इस मंदिर को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से मां के दरबार में आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि नवरात्र और दशहरा के दौरान मंदिर में विशेष उत्साह देखने को मिलता है।
29 वर्षों से बंगाल के कारीगर बना रहे मां की प्रतिमा
गणपतगंज के इस दुर्गा मंदिर की एक खास पहचान मां दुर्गा की आकर्षक प्रतिमा भी है। पूजा समिति के सदस्यों ने बताया कि पिछले 29 वर्षों से पश्चिम बंगाल के प्रसिद्ध कारीगर प्रशांत पॉल अपनी टीम के साथ यहां मां दुर्गा की प्रतिमा का निर्माण करते आ रहे हैं। उनके द्वारा तैयार की जाने वाली प्रतिमा श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहती है। प्रतिमा निर्माण में कारीगरों की कलात्मकता और मेहनत मंदिर की धार्मिक परंपरा को विशेष पहचान देती है। प्रत्येक वर्ष नवरात्र के दौरान मां की प्रतिमा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं।
वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संपन्न हो रही पूजा
मंदिर में पूजा-अर्चना का कार्य सुखपुर के आचार्य वैकुंठनाथ झा के नेतृत्व में संपन्न कराया जा रहा है। वहीं, भीखन ठाकुर वर्षों से मंदिर में ठाकुर के रूप में अपनी सेवाएं देते आ रहे हैं। इस वर्ष पूजा के यजमान उदय गुप्ता हैं। धार्मिक परंपराओं के अनुरूप पूजा-पाठ और अनुष्ठानों के आयोजन से मंदिर परिसर में आध्यात्मिक वातावरण बना हुआ है।

नवरात्र के प्रत्येक दिन मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा की जाती है। इसी क्रम में छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना की गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां कुष्मांडा को सृष्टि की रचयिता और ऊर्जा का स्वरूप माना जाता है। श्रद्धालु उनकी पूजा कर जीवन में सुख, आरोग्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा की कामना करते हैं।
स्थानीय पूजा समिति संभाल रही मंदिर की व्यवस्था
मंदिर के संचालन और पूजा से संबंधित व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी स्थानीय पूजा समिति संभाल रही है। समिति में अध्यक्ष दीनदयाल अग्रवाल उर्फ पप्पू अग्रवाल, सचिव बंटी अग्रवाल और कोषाध्यक्ष राजेश साह शामिल हैं। इसके अलावा वरिष्ठ सलाहकार समिति में उद्योतचंद कोठारी उर्फ बाबला, केदार माधोगड़िया, दीनानाथ अग्रवाल, मुरारीलाल शर्मा और ददन लाल अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
समिति के सदस्य नवरात्र और दशहरा के दौरान धार्मिक आयोजनों के संचालन तथा श्रद्धालुओं के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं में सहयोग करते हैं। मंदिर में हर साल होने वाले आयोजन स्थानीय लोगों की सहभागिता और सामूहिक सहयोग का भी उदाहरण हैं।
धार्मिक ही नहीं, सांस्कृतिक विरासत भी है मंदिर
पूजा समिति के सदस्यों का कहना है कि गणपतगंज का सार्वजनिक दुर्गा मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र ही नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा भी है। लगभग डेढ़ शताब्दी से अधिक पुराना यह मंदिर कई पीढ़ियों की आस्था और परंपराओं को अपने भीतर समेटे हुए है।
नवरात्र और दशहरा के अवसर पर यहां भव्य आयोजन किए जाते हैं, जिनमें गणपतगंज बाजार सहित आसपास के गांवों और क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। इन आयोजनों के माध्यम से धार्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक एकजुटता को भी मजबूती मिलती है।
मां दुर्गा के प्रति अटूट विश्वास, मंदिर का प्राचीन इतिहास, प्रतिमा निर्माण की वर्षों पुरानी परंपरा और स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी ने गणपतगंज के इस मंदिर को विशिष्ट पहचान दी है।







