Report: A.K Chaudhary
सुपौल जिले की गौरवशाली सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत को संरक्षित करने की दिशा में जिला प्रशासन द्वारा शुरू किए गए ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के अंतर्गत एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक उपलब्धि सामने आई है। जिलाधिकारी सावन कुमार के आह्वान पर चलाए गए इस विशेष अभियान के दौरान लगभग 500 वर्ष से अधिक पुरानी, 15वीं शताब्दी की दुर्लभ पांडुलिपियों का पता चला है। यह खोज न केवल सुपौल बल्कि संपूर्ण मिथिला क्षेत्र की समृद्ध ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक वैभव को उजागर करती है।

अभियान की सफलता के उपरांत जिलाधिकारी सावन कुमार, पुलिस अधीक्षक एस. सरथ तथा जिला संस्कृति पदाधिकारी तारकेश्वर पटेल अपनी टीम के साथ सुपौल जिले के गोसपुर गांव स्थित प्रतिष्ठित विद्वान एवं अटल मिथिला सम्मान से सम्मानित मैथिल पंडित आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र के आवास पर पहुंचे। यहां उन्होंने प्राप्त प्राचीन पांडुलिपियों का अवलोकन किया और उनके ऐतिहासिक महत्व पर विस्तृत चर्चा की।
मिथिला परंपरा के अनुरूप हुआ स्वागत
आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने मिथिला की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप जिलाधिकारी एवं पुलिस अधीक्षक का पाग, मिथिला पेंटिंग तथा पुष्पमाला भेंट कर भव्य स्वागत किया। इस अवसर पर उपस्थित अधिकारियों ने मिथिला की इस जीवंत सांस्कृतिक विरासत की सराहना की।
10 महत्वपूर्ण पांडुलिपियों की हुई पहचान
आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने इस अभियान के अंतर्गत 10 अत्यंत महत्वपूर्ण हस्तलिखित पांडुलिपियों की पहचान कर उन्हें प्रकाश में लाने का कार्य किया है। इन पांडुलिपियों को खोजकर उन्होंने जिले की ज्ञान-संपदा, सभ्यता और ऐतिहासिक पहचान को संरक्षित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
ये दुर्लभ पांडुलिपियाँ सुप्रसिद्ध विद्वान, व्याकरणाचार्य, वेद, न्याय, मीमांसा एवं धर्मशास्त्र के मर्मज्ञ तथा दरभंगा महाराज स्वर्गीय कामेश्वर सिंह के राजपंडित रहे पंडित त्रिलोकनाथ मिश्र की पारिवारिक धरोहर से प्राप्त हुई हैं। इस ज्ञान परंपरा को उनके वंशज पंडित शचींद्रनाथ मिश्र और आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने आज तक सुरक्षित रखा है।
संस्कृत एवं मिथिलाक्षर में लिखित हैं पांडुलिपियाँ
विशेषज्ञों के अनुसार प्राप्त पांडुलिपियाँ संस्कृत भाषा तथा प्राचीन मिथिलाक्षर लिपि में लिखी गई हैं। इनकी आयु लगभग 500 वर्ष या उससे अधिक मानी जा रही है। पांडुलिपियों में उस समय की शैक्षणिक, दार्शनिक, धार्मिक और सामाजिक चिंतन परंपराओं की झलक मिलती है।
इन दस्तावेजों का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं है, बल्कि वे उस युग की लेखन कला, ज्ञान-विज्ञान, पांडुलिपि निर्माण तकनीक तथा बौद्धिक उन्नति के सशक्त प्रमाण भी हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मिथिला क्षेत्र सदियों से ज्ञान और विद्वता का प्रमुख केंद्र रहा है।
भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षण का लक्ष्य
‘ज्ञान भारतम् मिशन’ का प्रमुख उद्देश्य जिले में बिखरी हुई ऐसी अमूल्य धरोहरों की खोज, दस्तावेजीकरण और संरक्षण करना है ताकि आने वाली पीढ़ियाँ अपनी सांस्कृतिक जड़ों और बौद्धिक परंपराओं से जुड़ी रह सकें। जिला प्रशासन इन पांडुलिपियों के वैज्ञानिक संरक्षण और डिजिटलीकरण की दिशा में भी प्रयास करने की योजना बना रहा है।
गोसपुर गांव की आध्यात्मिक पहचान की सराहना
पांडुलिपियों का अवलोकन करने के बाद जिलाधिकारी सावन कुमार ने गोसपुर गांव की विशेष प्रशंसा करते हुए कहा कि यह गांव वास्तव में आध्यात्मिक एवं विद्वतापूर्ण परंपराओं का केंद्र है। उन्होंने कहा कि अपनी सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत को खोजने तथा सहेजने की यह पहल अत्यंत सराहनीय है और इससे समाज में अपनी ऐतिहासिक पहचान के प्रति जागरूकता बढ़ेगी।
जिलाधिकारी को भेंट की पुस्तक ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’
इस अवसर पर आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र ने अपनी लिखित पुस्तक ‘धर्मो रक्षति रक्षितः’ जिलाधिकारी सावन कुमार को भेंट की। पुस्तक के संबंध में चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ऐसे ग्रंथों की समाज को अत्यधिक आवश्यकता है, जो भारतीय जीवन मूल्यों, संस्कृति और धर्म के वास्तविक स्वरूप को जन-जन तक पहुंचा सकें। उन्होंने यह भी कहा कि देशभर में बिखरी हुई हस्तलिखित पांडुलिपियों को खोजकर प्रकाश में लाना समय की मांग है। इस दिशा में कार्य कर रहे जिला संस्कृति पदाधिकारी तारकेश्वर पटेल के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें यशस्वी होने का आशीर्वाद प्रदान किया।
सम्मानित होंगे आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र
जिला प्रशासन ने घोषणा की है कि ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के तहत दुर्लभ पांडुलिपियों की खोज और संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए आचार्य धर्मेंद्रनाथ मिश्र को सम्मानित किया जाएगा। प्रशासन का मानना है कि ऐसे प्रयास न केवल जिले की पहचान को नई ऊंचाई देते हैं, बल्कि समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी कार्य करते हैं।
सांस्कृतिक पुनर्जागरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
सुपौल में ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के तहत हुई यह खोज केवल कुछ प्राचीन पांडुलिपियों की प्राप्ति नहीं है, बल्कि यह मिथिला की हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा, साहित्यिक वैभव और सांस्कृतिक गौरव को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यदि इन धरोहरों का समुचित संरक्षण और अध्ययन किया जाता है, तो आने वाले समय में यह शोधकर्ताओं, इतिहासकारों और संस्कृति प्रेमियों के लिए अमूल्य स्रोत सिद्ध हो सकती हैं।







