सुपौल में जिला स्तरीय कार्यशाला आयोजित, 200 से अधिक किसानों को दिया गया प्रशिक्षण

सुपौल के राघोपुर स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित जिला स्तरीय प्राकृतिक खेती कार्यशाला में 200 से अधिक किसानों ने भाग लिया। सांसद दिलेश्वर कामत ने प्राकृतिक खेती को किसानों की लागत घटाने और आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम बताते हुए इसे अपनाने का आह्वान किया।

Report: A.K Chaudhary

किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक करने और कम लागत में अधिक लाभकारी कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सुपौल जिले के राघोपुर स्थित कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके) में गुरुवार को प्राकृतिक खेती विषय पर एक जिला स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में जिले के विभिन्न प्रखंडों से आए 200 से अधिक किसानों ने भाग लिया और प्राकृतिक खेती से संबंधित नवीन तकनीकों, लाभों एवं व्यवहारिक पहलुओं की जानकारी प्राप्त की।

कार्यक्रम का शुभारंभ सुपौल सांसद दिलेश्वर कामत, जिला कृषि पदाधिकारी पप्पू कुमार, कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. नित्यानंद, जिला किसान मोर्चा अध्यक्ष पी.के. झा, भाजपा नेता बैजनाथ भगत, उपमुख्य पार्षद विनिता देवी सहित अन्य अतिथियों द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया।

मुख्य अतिथि सांसद दिलेश्वर कामत ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि वर्तमान समय में खेती की बढ़ती लागत किसानों के सामने बड़ी चुनौती बन गई है। ऐसे में प्राकृतिक खेती एक प्रभावी विकल्प के रूप में उभर रही है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती अपनाने से रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों पर होने वाला खर्च कम होता है, जिससे किसानों की उत्पादन लागत घटती है और उनकी आमदनी में वृद्धि होती है। उन्होंने किसानों से प्राकृतिक खेती को अपनाकर आत्मनिर्भर कृषि की दिशा में आगे बढ़ने का आह्वान किया।

कार्यशाला की अध्यक्षता कर रहे कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रधान वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. नित्यानंद ने प्राकृतिक खेती की अवधारणा, इसकी तकनीकों और दीर्घकालिक लाभों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक खेती न केवल मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में सहायक है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण तथा जैव विविधता को बढ़ावा देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती के दुष्प्रभावों को देखते हुए प्राकृतिक खेती भविष्य की आवश्यकता बनती जा रही है।

उन्होंने किसानों को जीवामृत, घनजीवामृत, बीजामृत, मल्चिंग तथा प्राकृतिक कीट प्रबंधन जैसी तकनीकों की जानकारी देते हुए बताया कि स्थानीय संसाधनों के उपयोग से खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती से उत्पादित फसलों की मांग बाजार में लगातार बढ़ रही है, जिससे किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त होने की संभावना रहती है।

कार्यक्रम में उपस्थित अन्य वक्ताओं ने भी प्राकृतिक खेती को किसानों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने का प्रभावी माध्यम बताया। वक्ताओं ने कहा कि प्राकृतिक खेती से जहां उत्पादन लागत कम होती है, वहीं भूमि की उत्पादकता लंबे समय तक बनी रहती है। इसके साथ ही लोगों को रसायन मुक्त और स्वास्थ्यवर्धक खाद्यान्न उपलब्ध होता है।

कार्यशाला के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को प्राकृतिक खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारियां प्रदान कीं तथा खेती में आने वाली विभिन्न चुनौतियों के समाधान के बारे में विस्तार से बताया। किसानों ने भी अपने अनुभव साझा किए और फसल उत्पादन, कीट नियंत्रण, मिट्टी की गुणवत्ता तथा बाजार से जुड़े सवाल विशेषज्ञों के समक्ष रखे, जिनका मौके पर समाधान किया गया।

प्रखंड कृषि पदाधिकारी मयंक झा ने बताया कि कृषि विभाग द्वारा किसानों को प्राकृतिक खेती के प्रति जागरूक करने के लिए लगातार प्रशिक्षण एवं कार्यशालाओं का आयोजन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सरकार की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, ताकि खेती को अधिक टिकाऊ, लाभकारी और पर्यावरण अनुकूल बनाया जा सके।

कार्यशाला में कृषि विभाग एवं कृषि विज्ञान केन्द्र के कई अधिकारी, कर्मचारी, कृषि विशेषज्ञ तथा बड़ी संख्या में किसान उपस्थित रहे। कार्यक्रम के अंत में किसानों ने प्राकृतिक खेती से जुड़ी जानकारी को उपयोगी बताते हुए इसे अपने खेतों में अपनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

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